क्या फर्क ?

कब का खोया,
उसने मुझे ।
क्या फर्क ?
वो क्या पाते हैं,
कि वो क्या खोते हैं ।।

कब का छोड़ा,
प्यार करना ।
क्या फर्क ?
वो दोस्ती ढोते हैं,
कि प्यार ढोते हैं ।।

कब का किया,
माफ उनको ।
क्या फर्क ?
वो शर्मिंदा होते हैं,
कि सफाई देते हैं ।।

कब का खोआ,
मेरा यकीन ।
क्या फर्क ?
वो दगा देते हैं,
कि दुआ देते हैं ।।

कब की खत्म,
पहुंच दिल तक ।
क्या फर्क ?
वो मलहम देते हैं,
कि जख्म देते हैं ।।

कब का खत्म,
यादों में डूबना ।
क्या फर्क ?
वो याद करते हैं,
कि फरयाद करते हैं ।।

कब का खत्म,
मेरा इंतजार ।
क्या फर्क ?
वो देर से आते हैं,
कि बार-बार आते हैं ।।

अब बुझती नहीं समा.....

आँखों में समा,
ख्वाहिशों में समा,...
तस्सबुर में समा,
ख्वाबों में समा,
इरादों में समा,
हौसलों में समा
इजहारों में समा
इंकारों में समा

अब बुझती नहीं समा
अब बुझती नहीं समा........
 

सारिक खान फिल्म समीक्षक

मेरे जन्म के पूर्व,
वर्णमाला बन चुकी थी,
शब्द बना लिये गये थे,
व्याकरण भी मैंने नहीं बनायी,
वाक्य बनाना मैंने औरों से सीखा,
समाचार पत्र भी बहुत दिनों से पढ़ रहा हूँ,
पुस्तकालय की उम्र मेरी उम्र से दुगुनी है,
दृष्टिकोण में पूर्वाग्रह विरासत में मिला है,
मेरा पेन भी किसी ने भेंट किया है.

अपनी पुस्तक के लेखक के रूप में,
सिर्फ स्वयं का नाम लिख रहा हूँ,
क्या आप मुझे क्षमा करेंगे ?

मौलिकता

न अनुवाद
न भावार्थ लिखो
जो लिखा है और ने,
उसे न बार-बार लिखो।

न समीक्षा,
न समालोचना,
स्वयं लिखो स्वयं का
औरों का न आधार लिखो ।

न टिप्पणी,
न प्रतिकिया,
बेकार लिखे पर
क्यों बेकार लिखो ।

ये बुढ़ापा

ये बुढ़ापा
शरीर के प्रति
उदासीनता के
पश्चाताप सा
ये बुढ़ापा

अपने आश्रितों के
प्रति उपकारों का
पुर्नरावलोकन
ये बुढ़ापा

पूर्व आश्रितों से
आश्रय की
अपेक्षा का
ये बुढ़ापा

अपनों के
निंदक व प्रशंसकों
का आभारी
ये बुढ़ापा

इंदियों का
भोग से
टूटता नाता
ये बुढ़ापा

मल-मूत्र से सना
नवजात शिशु सा
पूर्व सेवा का
प्रतिफल पाता
ये बुढ़ापा

लेटे बुढ़ापे को
देखकर सहमता
अभी चलता फिरता
ये बुढ़ापा

देख-सुन
बोल न पाता
और सोच न पाता
ये बुढ़ापा

बिस्तर से
अस्पताल होकर
श्मशान जाता
ये बुढ़ापा

संतुष्टि और व्यापार, सब बेकार

संतुष्टि और व्यापार
सब बेकार

गीत, गजल और साहित्य
लेखक से पूछो
सब बेकार

संतुष्टि और व्यापार
सब बेकार

गमलें, बगिया और पौधारोपण
माली से पूछो
सब बेकार

संतुष्टि और व्यापार
सब बेकार

मिलन, प्रेमिका और प्यार
शादीशुदा से पूछो
सब बेकार

संतुष्टि और व्यापार
सब बेकार

नमकीन, मीठा और अचार
हलवाई से पूछो
सब बेकार

संतुष्टि और व्यापार
सब बेकार

स्वप्न, कल्पना और विचार
मनोवैज्ञानिक से पूछो
सब बेकार

संतुष्टि और व्यापार
सब बेकार

भ्रमण, प्रकृति और सैर सपाटा
गाइड से पूछा
सब बेकार

संतुष्टि और व्यापार
सब बेकार

सत्य, संस्कार और सदाचार
स्वमन से पूछो
सब बेकार

संतुष्टि और व्यापार
सब बेकार

स्वयं पर एक हास्य कविता

बहुत दिनों के बाद ब्लॉग पर मैंने स्वयं पर एक हास्य कविता लिखी है, पाठक स्वयं पर न समझें ।
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समयाभाव, व्यस्तता ने धुरंधरो को भी धूल चटा दी ।
उसे ही माना सबने जिसने पुस्तक बेचकर दिखा दी ।।
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हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ

हे दीमकों के पालनहार
हे रद्दियों के उद्गार
विनती मेरी तुमसे बारंबार ।
अब होश में आओ

हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ ।
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हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ

हे उबाईयों के सृजनहार
हे आलसियों के सरदार
अब जाग भी जाओ

हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ


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हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ

लायब्रेरी की धूल पूछे
और कोसें अलमारियां
ग्रंथपालों की बेकारियों पर
कुछ तरस खाओ

हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ
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हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ

हे प्रकाशकों के दिवालियेपन
हे बुकस्टालों के गिरे मन
अब मान भी जाओ

हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ
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हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ

हे पुरूस्कारों के एकत्रालय
हे सम्मानों के संग्रहालय
पाठकों से भी न्याय कराओ

हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ
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हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ

हे संस्कृति विभाग के परिदानी
बिना काम की पेंशन है बेईमानी
सरकार का न खर्च बढ़ाओ

हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ
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हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ

हे भयभीत पत्रकार
हे छुपे हुए कलाकार
न करो लेखनी से अत्याचार
कुछ तो खुद को लजाओ

हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ
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हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ

हे किताबों के निःशुल्क वितरक
हे व्यावहारिकता के रिक्तक
भेंटों में भी
तरलता पसंदगी लाओ

हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ
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